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निष्काम भक्ति योग







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संवाद मन 5/11

 विरक्त महापुरुषों के सत्संग से प्राप्त ज्ञान रूप खड़ग के द्वारा मनुष्यको इस लोकमें ही अपने मोहबंधन को काट डालना चाहिए। फिर श्री हरि की लीलाओंके कथन और श्रवणसे भगवत स्मृति बनी रहनेके कारण वह सुगमतासे ही संसारमार्ग को पार करके भगवानको प्राप्त कर सकता है। भागवत महापुराण स्कंध 5 अध्याय 12 श्लोक 16.

भरत- मृगमोह

एक बार भरत जी गंडकी नदी में स्नान कर नित्य-नैमित्तिक तथा शौच आदि अन्य आवश्यक कार्यों से निवृत हो प्रणव का जाप करते हुए 3 मुहूर्ततक नदीकी धाराके पास बैठे रहे। 1 इसी समय एक हरिणी प्यास से व्याकुल हो जल पीने के लिए अकेली ही उस नदी के तीर पर आयी।2 अभी वह जल पी ही रही थी की पास ही गरजते हुए सिंह की लोकभयंकर दहाड़ सुनाई पड़ी। 3 हरिन जाति तो स्वभाव से ही डरपोक होती है। वह पहले ही चौकन्नी होकर इधर-उधर देखती जाती थी।अब ज्योंही उसके कान में वह भीषण शब्द पड़ा कि सिंहके डरके मारे उसका कलेजा धड़कने लगा और नेत्र कातर हो गए। प्यास अभी बुझी ही न थी, किंतु अब तो प्राणोंपर आ बनी थी। इसलिए उसनेभयवश एकाकी नदी पार करने के लिए छलांग मारी।4 उसके पेट में गर्भ था अतः चलते समय अत्यंत भय के कारण अपने स्थान से हटकर योनि द्वार से निकलकर नदी के प्रभाव में गिर गया। 5 राजर्षि भरत ने देखा कि बेचारा हरिणी का बच्चा अपने बंधुओं से बिछड़ कर नदी के प्रवाह में बह रहा है इससे उन्हें उस पर बड़ी दया आई और भी आदमी के समान उस मात्र हीन बच्चे को अपने आश्रम पर ले आए। 7 उस मृग छौने के प्रति भरतजी की ममता उत्तरोत्तर बढ़ती गई।वह नित्