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भरत चरित्र 5/7




 


गंडकी नदी
उस पुलहाश्रमके उपवनमें एकान्त स्थानमें अकेले ही रहकर वे अनेक प्रकारके पत्र, पुष्प, तुलसीदल, जल और कन्द-मूल-फलादि उपहारोंसे भगवान्‌की आराधना करने लगे⁠। इससे उनका अन्तःकरण समस्त विषयाभिलाषाओंसे निवृत्त होकर शान्त हो गया और उन्हें परम आनन्द प्राप्त हुआ ⁠।⁠।⁠११⁠।⁠। 

इस प्रकार जब वे नियमपूर्वक भगवान्‌की परिचर्या करने लगे, तब उससे प्रेमका वेग बढ़ता गया—जिससे उनका हृदय द्रवीभूत होकर शान्त हो गया, आनन्दके प्रबल वेगसे शरीरमें रोमांच होने लगा तथा उत्कण्ठाके कारण नेत्रोंमें प्रेमके आँसू उमड़ आये, जिससे उनकी दृष्टि रुक गयी⁠। अन्तमें जब अपने प्रियतमके अरुण चरणारविन्दोंके ध्यानसे भक्तियोगका आविर्भाव हुआ, तब परमानन्दसे सराबोर हृदयरूप गम्भीर सरोवरमें बुद्धिके डूब जानेसे उन्हें उस नियमपूर्वक की जानेवाली भगवत्पूजाका भी स्मरण न रहा ⁠।⁠।⁠१२⁠।⁠। 

इस प्रकार वे भगवत्सेवाके नियममें ही तत्पर रहते थे, शरीरपर कृष्णमृगचर्म धारण करते थे तथा त्रिकालस्नानके कारण भीगते रहनेसे उनके केश भूरी-भूरी घुँघराली लटोंमें परिणत हो गये थे, जिनसे वे बड़े ही सुहावने लगते थे⁠। वे उदित हुए सूर्यमण्डलमें सूर्यसम्बन्धिनी ऋचाओंद्वारा ज्योतिर्मय परमपुरुष भगवान् नारायणकी आराधना करते और इस प्रकार कहते— ⁠।⁠।⁠१३⁠।⁠।

 ‘भगवान् सूर्यका कर्मफलदायक तेज प्रकृतिसे परे है⁠। उसीने संकल्पद्वारा इस जगत्‌की उत्पत्ति की है⁠। फिर वही अन्तर्यामीरूपसे इसमें प्रविष्ट होकर अपनी चित्-शक्तिद्वारा विषयलोलुप जीवोंकी रक्षा करता है⁠। हम उसी बुद्धिप्रवर्त्तक तेजकी शरण लेते हैं’ ⁠।⁠।⁠१४⁠।⁠।

 इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां पञ्चमस्कन्धे भरतचरिते भगवत्परिचर्यायां सप्तमोऽध्यायः ⁠।⁠।⁠७⁠।⁠।

भगवान सूर्य का कर्मफलदायक तेज प्रकृतिसे परे है। उसी ने संकल्प द्वारा इस जगत की उत्पत्ति की है। फिर वही अंतर्यामीरूपसे इसमें प्रविष्ट होकर अपनी चित्-शक्ति द्वारा विषय लोलुप जीवोकी रक्षा करता है। हम उसी बुद्धि प्रवर्तक तेज की शरण लेते हैं।

भागवत महापुराण स्कंध 5 अध्याय 7 श्लोक 14


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भरत- मृगमोह

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